“आज सपने में मा आई ”

तु ढोती है सबके पापो को,
तेरे हर बून्द में राख बसे।
तु पवित्र करे हर धरती को,
उस धरती का कुपुत्र गरीब हु।
मा तु मेरी गंगा है,
मै तेरे बहुत करीब हु।

तु अम्बर से उतरी धारा है,
जिसका हर शोक किनारा है।
गंदी, मैली साँसों में मा,
मै लाचार खड़ा बेचारा हु,
मा के आँचल, मैल मै पोछु।
देखो मै मन से गरीब हु,
मा तु मेरी गंगा है,
मै तेरे बहुत करीब हु।

तेरे आँचल को कैसे साफ करू,
मै खुद को कैसे माफ़ करू।
तेरे लहरों ने काश छुआ होता,
मन को भी पुनीत किया होता।
इन हड्डी कंकालो की जगह,
शायद पुष्प कभी होता।

बेटा! तु चिन्ता मत कर,
हर कण में अमृत रखती हु।
ताल, समन्दर, अंबर मेरी,
हर जल के बून्द में बसती हु।
तेरे सपने में आ कर,
आज तुझे बताना है,
हर बून्द को गंगा मान ले,
हर कण को तुझे बचाना है।

मै भारत की बहती माता हु,
मै सदा रहूँगी बेटो की।
तु काम में लग जा बेटा अब,
मै सदा रहूँगी तेरी ही ।

:-गुमनाम

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क्या कहना

जो चंचल मन था उसका,
अब शांत सा लगता है।
बेचैन सी है वो,
मन कुछ तो कहता है।
फूरसत में तुम, आओ कभी,
मुझे संग तेरे है, गुनगुनाना।
इसी बात पे बात हो जाए,
तो क्या कहना।

वो चेहरे पे मासूमियत,
वो सहज भरी बातें।
जब तुम खुली किताब थी,
वो एक रात की बातें।
गुलबहार की महक में,
बात करते, चलते रहना।
इसी बात पे बात हो जाए,
तो क्या कहना।

तुम्हारे भीतर जो देखा था,
वो आज़ाद परिंदा कहा गया।
जिसे ढूँढता हू मै अब,
वो मस्त सा मुखड़ा कहा गया।
नाराज़गी अब छोड़ दो,
मुस्कान ही था, तेरा गहना।
इसी बात पे बात हो जाए,
तो क्या कहना ।

एक वादा करदो मुझसे अब,
चाहे कुछ भी हो जीवन में,
मस्त मगन हो कर। रहना।
इसी बात पे बात हो जाए,
तो क्या कहना ।

:-गुमनाम

“कहा खो गया”

ये ताकत, ये रूतबा कहा खो गया,
अकेले है हम,
ये जहाँ सो गया।
वो आशिक वो पागल कहा खो गया,
अकेले है हम,
ये जहाँ सो गया।

ऐसी हालत ना थी, जब हुए रूबरू,
गुस्ताखी भी इश्क का शिकार हो गया।
अकेले है हम,
ये जहाँ सो गया ।

उनसे बातें तो की थी,
हजारों दफा।
डगरता, मंडराता भवरा हो गया ।
अकेले है हम,
ये जहाँ सो गया ।

सारी खुशियाँ वो मस्ती,
कहा खो गया।
अकेले है हम,
ये जहाँ सो गया ।।

:-गुमनाम

“दोस्ती हार मान गई”

ना इश्क हुआ, ना ही दोस्ती हुई,
दोनों को बीच राह छोड़ आए हम।
इश्क के फेरे में, दोस्ती भी टूटी,
दोस्ती के खातिर, इश्क तोड़ आए हम।

हो गए थे आदि उनके,
सब कुछ बोल आए हम।
दो पल ज्यादा बात क्या होति,
सब भेद खोल आए हम।
दोस्ती, इश्क पर भारी पड़ गई,
इज्ज़त भी दोस्ती से तोल आए हम।

इश्क ने ज़रा सी खटास क्या डालि,
आज दोस्ती,
भरी महफ़िल में बदनाम हो गया।
कल तक जो दिलों के पास रहते थे,
एक पल में सब कुछ, अंजान हो गया।
दोस्ती में जो खिला बाग था कभी,
आज इश्क में वो भी,
सूना शमशान हो गया।
दोस्ती निभाने में हम कब,
दोगले हो गए।
वो आशिकी में फिर से,
महान हो गया।

आखिर में वो खटास,
पूरा रंग ला गइ।
दो बिछुड़े आशिकों को,
फिर संग ला गइ।
इश्क ने कहा!
“अब तुम हार मान लो” ।
उस गहरे ज़ख्म को,
वो आज फिर जला गइ।

:- गुमनाम

“अंकल मै बच्ची हूँ , यह कैसे तुम्हे बतलाऊं मैं।“

“अंकल मै बच्ची हूँ
, यह कैसे तुम्हे बतलाऊं मैं।“

यह कैसा प्रेत समाया है,
यह कैसी काली साया है,
यह बर्बरता का नंगा नाच
यह मौन देखता क्रूर समाज।
यह कटे, छिले, धब्बे लेकर,
किस वैद्य के पास अब जाउ मै।
अंकल मै बच्ची हूँ,
यह कैसे तुम्हे बतलाऊं मैं ।

मेरा रेप नहीं हुआ,
यह चीख-चिख कर कहती हूँ
न जाने कितने भीतर,
उन विषैले काटों को सहती हूँ।
अब गंगा पवित्र नहीं रही,
फिर भी वैसे ही बहती हूँ।
हर मूंछ वाले जानवर से अब
यु डर-डर के रहती हूँ।
अब साँसे जाने वालि है,
किस न्याय के घर को जाउ मै।
अंकल मै बच्ची हूँ,
यह कैसे तुम्हे बतलाऊं मैं।

क्या हुआ है मेरे साथ,
अभी तक मुझको पता नहीं।
यह फटे चिथड़े है धड़ के,
मै सिसक-सिसक कर रोती रही।
जा रही हूँ यह धब्बे लेकर,
मै स्वर्गद्वार पे कह दूंगी,
देखो ! अब खबर हो गई हूँ मै।
अंकल मै बच्ची हूँ,
यह कैसे तुम्हे बतलाऊं मैं।

:-गुमनाम

“माॅ तुम बहुत याद आती हो”

अरसा बीत गया है मानो,
तुमसे बात नहीं की मैंने।
क्यु ऐसा लगता है,
मेरी हिचकियों में तुम हो,
माॅ मै तुमसे दूर हूँ,
तूम बहुत याद आती हो।

भोजन भी स्वादिष्ट मिलते हैं,
पर उनमें स्वाद नहीं मिलता।
दोस्ती यारी भी सबसे अच्छी है,
पर मन नहीं खिलता।
अकेले रह कर बिगड़ गया हूँ,
माॅ तुम तो शांत समन्दर हो।
माॅ मै तुमसे दूर हूँ,
तुम बहुत याद आती हो।

चोट लगे तब भी हस दु,
तुम्हारा साथ चाहिए बस।
दवा दारू की फिक्र किसे है,
सर पे हाथ चाहिए बस।
मेरे बिमारियों का तुम्हे पता कैसे है,
मानो कोई चकित जादू हो,
माॅ मै तुमसे दूर हूँ,
तुम बहुत याद आती हो।

कितनी बातें है लिखने को,
पर उतना लिख ना पाऊँगा।
अभी पैसे बटोर रहा हूँ मै,
घर जल्द ही आऊंगा।
हर बार यही सुन कर के,
तुम यु मान जाति हो ।
माॅ मै तुमसे दूर हूँ,
तुम बहुत याद आती हो ।

:- गुमनाम

नैत्रित्व

कल फिर रात आएगी, अंधेरा गुम हो जाएगा ।
सबके साथ तू भी चल, ये मौसम फिर ना अाएगा।

मुहब्बत दे रहे है सब, अभी तो शाम बाकी है ।
गार्दिश मे है सितारे, अभी अंजाम बाकी है ।

किसने कहा क्या क्या कहा, यह भूल तुम जाओ।
मुहब्बत, बैर, यारी है क्या , अब तुम सामने आओ ।

सुरज थक गया है अब , काली रात आएगी ।
तारो मे लगी है होड़, वह जगह भर भी जाएगी ।

भेड़ और भेड़ियों मे, अंतर समझ लो बस ।
जल्द ही चारो तरफ तुम्हारा दब-दबा हेगा ।।
गुमनाम