“धोखा नाम चीज़ है केवल”

धोखा शब्द नहीं केवल,
इसके रूप कइ विस्तार है।
कई रहस्य दबे है इसके,
हर बार समय कि पुकार है।

त्रेतायुग खत्म होना था,
तो अपहरण हुआ था धोखे से,
लक्षमण को जो थी बाण लगी,
जो गिरी हिला था जड़ से,
जो पर्वत बजरंग लाए थे।
जिससे हर कोशिश हुई प्रबल,
धोखा नाम चीज़ है केवल।

एकलव्य का अंगूठा दान हुआ,
कवच-कुण्डल भी कर्ण ने दिया।
यह सब इसके ही रूप थे,
कहीं दक्षिणा तो कही,
महान दान भी नाम हुआ।
द्वापर युग का समापन हुआ,
जो वक्त के कोख में रहा था पल,
जिसके समक्ष न चला कोई बल,
धोखा नाम चीज़ है केवल।

इससे राम ने मारा बाली को,
इसने नाम दिया विद्वानों को,
बरबरी मरा, गुरु द्रोण मरे,
कितने वीर गिरे उस माटी पे।
वरना अर्जुन भी कुछ खास न था,
न थे पाण्डव कर्ण से प्रबल,
जब यही बचा था मात्र एक हल,
धोखा नाम चीज़ है केवल।

नया दौर था लाने को,
अहम्, अंधेरा मिटाने को।
जब आशा जरूरत कि आती है,
जब षडयंत्र धोखा बन जाति है।
जब विजय राज सिर्फ होता फल,
तब राह दिखती, धोखा केवल।
धोखा शब्द मात्र है केवल,
धोखा नाम चीज़ है केवल।

:-गुमनाम

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आज फिर काम पर जाना है ।

कुछ उम्मीदें जली है, कोई आरज़ू पली है।
हर रोज़ की तरह, आज फिर कली खिली है।
रोटी के सपने देख कर, जो रात ढली है ।
घर पालने देखो सूबे, नन्ही क़दम चली है ।

ये डगमगाते, लड़खड़ाते,
कदम नहीं थकते।
खुद्दार है ये जिंदगी,
भिख मांग नहीं सकते ।
जो मीन कीचड़ में फसी,
उसे बून्द कि तलाश है।
आज भाई को रोटी कम पड़ी,
आज मन भी हताश है।

ये आँखे सपना नहीं रखती,
बस चेहरे खिलखिलाते है।
दिवारे चिसी है पत्थरों से,
बस्ते भरी किताबे, कुछ याद दिलाते है।

दो चवन्नियो कि कोशिश में,
हर रोज़ जलता हु।
नंगे पाँव, फटे कपड़े,
इस रवि कि गर्मी में,
हर रोज़ गलता हु।

पैसे खत्म, सूरज ढला
रूहें कि बातियो से, अब अंजोर होगा।
जो भूखे पेट रहेगा,
सुबह का वही चोर होगा।
चलो सड़कों कि गोद में,
दो पल मार ले, नींद के।
गाड़ियाँ बहुत आ रही है,
यारो! अब शोर होगा।

“आज सपने में मा आई ”

तु ढोती है सबके पापो को,
तेरे हर बून्द में राख बसे।
तु पवित्र करे हर धरती को,
उस धरती का कुपुत्र गरीब हु।
मा तु मेरी गंगा है,
मै तेरे बहुत करीब हु।

तु अम्बर से उतरी धारा है,
जिसका हर शोक किनारा है।
गंदी, मैली साँसों में मा,
मै लाचार खड़ा बेचारा हु,
मा के आँचल, मैल मै पोछु।
देखो मै मन से गरीब हु,
मा तु मेरी गंगा है,
मै तेरे बहुत करीब हु।

तेरे आँचल को कैसे साफ करू,
मै खुद को कैसे माफ़ करू।
तेरे लहरों ने काश छुआ होता,
मन को भी पुनीत किया होता।
इन हड्डी कंकालो की जगह,
शायद पुष्प कभी होता।

बेटा! तु चिन्ता मत कर,
हर कण में अमृत रखती हु।
ताल, समन्दर, अंबर मेरी,
हर जल के बून्द में बसती हु।
तेरे सपने में आ कर,
आज तुझे बताना है,
हर बून्द को गंगा मान ले,
हर कण को तुझे बचाना है।

मै भारत की बहती माता हु,
मै सदा रहूँगी बेटो की।
तु काम में लग जा बेटा अब,
मै सदा रहूँगी तेरी ही ।

:-गुमनाम

क्या कहना

जो चंचल मन था उसका,
अब शांत सा लगता है।
बेचैन सी है वो,
मन कुछ तो कहता है।
फूरसत में तुम, आओ कभी,
मुझे संग तेरे है, गुनगुनाना।
इसी बात पे बात हो जाए,
तो क्या कहना।

वो चेहरे पे मासूमियत,
वो सहज भरी बातें।
जब तुम खुली किताब थी,
वो एक रात की बातें।
गुलबहार की महक में,
बात करते, चलते रहना।
इसी बात पे बात हो जाए,
तो क्या कहना।

तुम्हारे भीतर जो देखा था,
वो आज़ाद परिंदा कहा गया।
जिसे ढूँढता हू मै अब,
वो मस्त सा मुखड़ा कहा गया।
नाराज़गी अब छोड़ दो,
मुस्कान ही था, तेरा गहना।
इसी बात पे बात हो जाए,
तो क्या कहना ।

एक वादा करदो मुझसे अब,
चाहे कुछ भी हो जीवन में,
मस्त मगन हो कर। रहना।
इसी बात पे बात हो जाए,
तो क्या कहना ।

:-गुमनाम

“कहा खो गया”

ये ताकत, ये रूतबा कहा खो गया,
अकेले है हम,
ये जहाँ सो गया।
वो आशिक वो पागल कहा खो गया,
अकेले है हम,
ये जहाँ सो गया।

ऐसी हालत ना थी, जब हुए रूबरू,
गुस्ताखी भी इश्क का शिकार हो गया।
अकेले है हम,
ये जहाँ सो गया ।

उनसे बातें तो की थी,
हजारों दफा।
डगरता, मंडराता भवरा हो गया ।
अकेले है हम,
ये जहाँ सो गया ।

सारी खुशियाँ वो मस्ती,
कहा खो गया।
अकेले है हम,
ये जहाँ सो गया ।।

:-गुमनाम

“दोस्ती हार मान गई”

ना इश्क हुआ, ना ही दोस्ती हुई,
दोनों को बीच राह छोड़ आए हम।
इश्क के फेरे में, दोस्ती भी टूटी,
दोस्ती के खातिर, इश्क तोड़ आए हम।

हो गए थे आदि उनके,
सब कुछ बोल आए हम।
दो पल ज्यादा बात क्या होति,
सब भेद खोल आए हम।
दोस्ती, इश्क पर भारी पड़ गई,
इज्ज़त भी दोस्ती से तोल आए हम।

इश्क ने ज़रा सी खटास क्या डालि,
आज दोस्ती,
भरी महफ़िल में बदनाम हो गया।
कल तक जो दिलों के पास रहते थे,
एक पल में सब कुछ, अंजान हो गया।
दोस्ती में जो खिला बाग था कभी,
आज इश्क में वो भी,
सूना शमशान हो गया।
दोस्ती निभाने में हम कब,
दोगले हो गए।
वो आशिकी में फिर से,
महान हो गया।

आखिर में वो खटास,
पूरा रंग ला गइ।
दो बिछुड़े आशिकों को,
फिर संग ला गइ।
इश्क ने कहा!
“अब तुम हार मान लो” ।
उस गहरे ज़ख्म को,
वो आज फिर जला गइ।

:- गुमनाम

“अंकल मै बच्ची हूँ , यह कैसे तुम्हे बतलाऊं मैं।“

“अंकल मै बच्ची हूँ
, यह कैसे तुम्हे बतलाऊं मैं।“

यह कैसा प्रेत समाया है,
यह कैसी काली साया है,
यह बर्बरता का नंगा नाच
यह मौन देखता क्रूर समाज।
यह कटे, छिले, धब्बे लेकर,
किस वैद्य के पास अब जाउ मै।
अंकल मै बच्ची हूँ,
यह कैसे तुम्हे बतलाऊं मैं ।

मेरा रेप नहीं हुआ,
यह चीख-चिख कर कहती हूँ
न जाने कितने भीतर,
उन विषैले काटों को सहती हूँ।
अब गंगा पवित्र नहीं रही,
फिर भी वैसे ही बहती हूँ।
हर मूंछ वाले जानवर से अब
यु डर-डर के रहती हूँ।
अब साँसे जाने वालि है,
किस न्याय के घर को जाउ मै।
अंकल मै बच्ची हूँ,
यह कैसे तुम्हे बतलाऊं मैं।

क्या हुआ है मेरे साथ,
अभी तक मुझको पता नहीं।
यह फटे चिथड़े है धड़ के,
मै सिसक-सिसक कर रोती रही।
जा रही हूँ यह धब्बे लेकर,
मै स्वर्गद्वार पे कह दूंगी,
देखो ! अब खबर हो गई हूँ मै।
अंकल मै बच्ची हूँ,
यह कैसे तुम्हे बतलाऊं मैं।

:-गुमनाम